पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१२४

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( १०९ ) वाला होता है । वह कद, मूल, फल और दलो या पत्तो का नाश करता है और उसके मारे कीचड़, मछलिया, बिलो मे घुसे सांप और गुफाओ मे घुसे हुये हुए कोल ( बाराह ) तथा द्विरद ( हाथी ) कहीं बच पाते हैं । अर्थात् नहीं बच पाते। यह तो उनका दिन कृत अर्थात् दिन प्रतिदिन का विलास या मनोरजन है। वह (शवरदल ) वन-वन मे घूमकर चर और अचर जीवो का जीवन हरण करता रहता है और ( केशवदास कहते हैं ) कि उनका निवास स्थान मृगशिर (हिरनो के सिर) तथा श्रवण ( कानो ) से भरा रहता है अर्थात् उनके निवास स्थान मे हिरनो के कटे हुए अग प्रत्यङ्ग मिला करते है या मृगो के शिरो से श्रवित ( टपकता हुआ ) रक्त भरा रहता है । वह थल बली (शवरदल) हाथ मे धनुष और निपानि (अचूक) सर वाण) लिए घूमता रहता है । उसी प्रकार- __ग्रीष्म भी चडकर कलित ( सूर्य की प्रचड किरणो से युक्त ) रहता है और सदागति अर्थात् श्रेष्ठवायु या लू के झोको से युक्त रहता है। उसमे कन्द, मूल, फल, फूल और पत्तो का नाश होता रहता है। ग्रीष्म मे दिवकृत ( सूर्य) का विलास (प्रभाव ) ऐसा रहता है कि कोचड़ मे मछलिया, बिल में घुसकर सर्प और गुफागो मे घुसकर कोल (सूअर) तथा द्विरद ( हाथी) किसी प्रकार बच पाते है। ग्रीष्म थल और जल के चर अचर जीवो का जीवन ( जल ) हरने वाला होता है। इसमे मृगशिरा नक्षत्र तपता है और श्रवन अर्थात् बरसता नहीं। इसमे बली ( गैंडाजन्तु) धनुष अर्थात् मरु-भूमि की भाति हत-प्यासा होकर निपानि सर ( पानी रहित ) तालाब की ओर दौड़ता रहता है। (३) वर्षा वर्णन दोहा वरषा हॅस पयान, बक, दादुर, चातक मोर । केतिक पुष्प, कदम्ब, जल, सौदामिनी घनघोर ॥३१॥