पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१२५

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वर्षा मे हसो का मानसरोवर को पयान, बक ( बगुला) दादुर, ( मेढक ), चातकपक्षी, ओर मोर, केतको पुष्प, कदम्ब, जल ( वर्षा ) बिजलो तथा बादलो की गडगडाहट का वर्णन किया जाता है । उदाहरण कवित्त भौहें सुरचाप चार प्रमुदित पयोधर, भूख न जराय जोति तड़ित रलाई है। दूरि करी सुख मुख सुखमा ससी की नैन, अमल कमल दल दलित निकाई है। 'केशोदास' प्रबल करेनुका गमन हर, मुकुत सुहंसक-सबद सुखदाई है। अबर बोलत मति सो है नीलकंठ जू की, कालिका कि वर्षा हरिष हिय आई है ॥३२॥ यह कालिका देवो है या हृदय को हरषाती हुई वर्षा ऋतु आई है, क्योकि इन्द्रधनुष ही उनकी सुन्दर भौंहे है, बादल उन्नत कुच है, बिजली की चमक उनके जडाऊ गहनो की ज्योति है। उन्होने अपने मख की शोभा से चन्द्रमा की शोभा को दूर कर दिया है और उनके नेत्रो ने स्वच्छ कमलो की पखुडियो की शोभा को भी दलित कर दिया है। 'केशवदास' कहते हैं कि वह मतवालो हथिनी की चाल को भी हरने वाली है । उनके बिछुओ की ध्वनि स्वच्छन्द रूप से हो रही है। जो सुख देने वाली है। उन्होने नीला कपड़ा पहन लिया है और नीलकठ ( श्रीशंकरजी ) की मति को मोहित करती है । उसी प्रकार- वर्षा मे भी ( भय ) है अर्थात् अनेक तरह के कीडे पतगो का भय है। सुर-चाप ( इन्द्रधनुष) दिखलाई पडता है, उमडे हुए बादल दृष्टिगोचर होते हैं और बिजली की चंचल चमक दिखलायी पडती है। चन्द्रमा के मुख की शोभा दूर हो गई है और (नैन अमल) नदियों