पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१२६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


स्वच्छ नहीं रहती। 'केशवदास' कहते हैं कि प्रबलक अर्थात् प्रबल जलधारा रेनुका हर धूल को बहा ले जाने वाली ) हो जाती है और ममन अर्थात् चलना फिरना रुक जाता है । हसो के सुखदाई शब्दो से देश भर रहित हो जाता और भौरो की मति मोहित होती है । (४) शरद वर्णन दोहा अमल अकास प्रकास ससि, मुदित कमल कुल कॉस। पंथी, पितर पयान नृप, शरद सु केशवदास ॥३॥ 'केशवदास' कहते हैं कि शरद ऋतु मे आकाश निर्मल हो जाता है, चन्द्रमा का प्रकाश उज्जवल दिखलाई पडता है, कमल तथा कास मुदित होते हैं ( फूलते हैं ) और पथिक, पितर तथा राजाओ का पयान (गमनागमन ) आरम्भ होता है। उदाहरण कवित्त सोभा को सदन, ससि बदन मदन कर, बंदै नर देव कुबलय बरदाई है। पावन पद उदार, लसति हंस के मार, दीपति जलज हार दिसि दिसि धाई है। तिलक चिलक चारु लोचन कमल रुचि, चतुर चतुर मुख जग-जिय भाई है। अमर अंबर नील लीन पीन पयोधर, 'केशौवदास' शारदा कि शरद सुहाई है॥३४॥ 'केशवदास' कहते है कि यह श्री शारदा जी हैं या सुन्दर शरद ऋतु हैं, क्योकि जिस प्रकार श्री शारदा जी का मुख शोभा युक्त चन्द्रमा की भाँति होता हुआ भी मद या अभिमान उत्पन्न करने वाला नहीं है अर्थात् ( उन्हे अपने मुख की शोभा का तनिक भी अभिमान नहीं है )