पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
( ३ )

गढ़ कुंडार तिनके भये, राजा साहनपाल । सहजकरण तिनके भये, कहि केशव रिपु काल ॥१०॥ राजा नौनिकदे भये, तिन के पूरणसाज । नौनिकदे के सुत भये, पृथुज्यों पृथ्वीराज ॥११॥ रामसिह राजा भये, तिन के शूर समान । राजचन्द्र तिनके भये, राजा चन्द्र प्रमान ॥१२॥ राय मेदनीमल भये, तिन के केशवदास । अरिमद मरदन मेदिनी, कीन्हों धरम प्रकास ॥१३॥ राजा अर्जुनदे भये, तिन के अर्जुन रूप। श्रीनारायण को सखा, कह सकल मुविभूप ॥१४॥ महादान षाड़श दथे, जीती जग दिशिचारि । चारौ वेद अटारहौ, सुने पुराण विचारि ॥१५॥ रिपुखण्डन तिनके भये, राजा श्री मलखान । युद्ध जुरे न मुरे कहूँ, जानत सकल जहान ॥१६॥ नृप प्रतापरुद्र सु भये, तिनके जनु रणरुद्र । दया दान को कल्पतरु, गुणनिधि शीलसमुद्र ॥१७॥ नगर ओरछो जिन रच्यो, जगमे जागति कृत्ति । कृष्णदत्त मिश्रहि दई, जिन पुराण की वृत्ति ॥१८॥ भरतखण्ड मण्डन भये, तिनके भारतचन्द । देश रसातल जात जिहि, फेरयो ज्यों हरिचन्द्र ॥१॥ शेरशाहि असलम के, उर शाली शमशेर । एक चतुरभुज हू नयो, ताको शिर तेहि वेर ॥२०॥ ब्रह्मादिक की विनय से समस्त पृथ्वी का भार दूर करने के लिए सूर्यवंश मे श्रीरामचन्द्र का अवतार हुआ। उसी सूर्यवश के अन्तर्गत जमत-प्रसिद्ध गहरवार कुल मे, कलियुग के बैरी और रणधीर राजा वीरसिंह प्रकट हुए। उनके पुत्र राजा करण हुए जिन्होंने पृथ्वी पर