पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१४

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धर्म का प्रकाश फैलाया और सार जगत को जीतकर काशी में निवास किया। वहाँ उनके नाम से करण-तीर्थ अब भी प्रसिद्ध है। उनके पुत्र अर्जुनपाल राजा हुए, जो महोनी गांव में रहने लगे। उनके पुत्र राजा साहनपाल हुए जिन्होने गडकुडार में निवास कया। उनके पुत्र सहज- करण हुए जो शत्रुओ के लिए काल स्वरूप थे। उनके पुत्र राजा 'नौ- निकदेव' हुए और नौनिक देव के पुत्र पृथु के समान पृथ्वीराज' हुए। उनके पुत्र सूर्य के समान राजा रामसिंह हुए और 'रामसिह' के पुत्र चन्द्रमास्वरूप रामचन्द्र हुये । 'रजचन्द्र' के पुन राय 'मेदिनीमल' हुए जिन्होने शत्रुओ का घमन्ड चूर करके पृथ्वी पर धर्म का प्रकाश फैलाया । उनके पुत्र अर्जुन स्वरूप राजा अर्जुन देव हुए जिन्हे पृथ्वी के सभी राजा श्रीनारायण का मित्र ही कहा करते थे और जिन्होने षोडष महादान दिये तथा चारो दिशाओ के राजाओ को जीत लिया और चारो वेद तथा अठारहो पुराणो को सुना। उनके पुत्र, वैरियो को मारने वाले श्री मलखा- नसिह हुए जो कभी युद्ध होने पर पीछे नहीं मुडे और जिन्हे सारा जगत जानता था । उनके पुत्र युद्ध मे रुद्ररूप धारण करने वाले 'प्रतापरुद्ध' हुए जो दया तथा दान के कल्पतरु और गुणो के कोष तथा शील के समुद्र थे। उन्होने 'ओरछा' नगर बसाया जिससे ससार मे उनकी कीर्ति फली तथा कृष्णदत्त मिश्र को पुराण सुनाने को वृत्ति प्रदान की। उनके पुत्र भारतवर्ष की शोभा-स्वरूप भारतीचन्द हुए जिन्होने हरिचन्द्र के समान देश फो रसातल जाने से बचा लिया और शेरशाह असलेम की छाती मे तलवार घुसेड दी। अपने समय मे उन्होने श्री चतुर्भुज नारायण को छोड और किसी दूसरे को सिर नहीं मुकाया। उपजि न पायो पुत्र तेहिं, गयो सु प्रभु सुरलोक । सोदर मधुकरशाह तब, भूप भये मुरिलोक ॥२१॥ जिनके राज रसा बसे, केशव कुशल किसान । सिन्धु दिशा नहिं वारही, पार वजाय निशान ॥२२॥