पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१३२

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( ११७ ) उदाहरण (कवित्त) नगर नगर पर घन ही तो गाजै घोर, ईति की न भीति, भीति अघन अधीर की । अरि नगरीन प्रति करत अगम्या गौन, भावै व्यभिचारी, जहाँ चारी परपीर की। शासन का नाशन करत एक गधवाह, 'केशोदास' दुर्ग नही दुर्गति शरीर की । दिसि-दिसि जीति पै अजीति द्विजदीननिसों, ऐसी रीति राजनीति राजै रघुवीर की ॥५॥ श्री रामचन्द्र जी की राजनीति से देशभर में ऐसी सुख शान्ति विराज रही है कि नगरो पर चढाई करनेवाला कोई नहीं है, केवल बादल ही उनपर घोर गर्जना किया करते हैं। ईतियो ( खेती को हानि पहुचाने वाले सात प्रकार के भय ) का कोई भय नहीं है । भय है तो केवल पाप और अधीरता का है। अगम्या गमन केवल शत्रुओ की नगरी पर ही किया जाता है। केवल भाव ही व्यभिचारी है ( अर्थात् केवल भावो का उल्लेख करते समय व्यभिचारी शब्द सुनाई पडता है, नहीं तो वास्तविक व्यभिचारी कोई है ही नहीं) और दूसरो की पीडा को ही चोरी की जाती है अन्यथा चोरी है ही नहीं। शासन ( आज्ञा) का नाश ( उल्लधन ) केवल वाय करती है अर्थात् चाहे जहाँ बिना रोक-टोक जाया करती है। 'केशवदास' कहते है कि उनके राज्य मे केवल दुर्गो (किलो) ही के शरीरो की दुर्गति रहती है, क्योकि उन्हीं के शरीर टेढे-मेढे रहते है अन्यथा किसी की भी दुर्गति नहीं होती उनकी राजनीति सभी स्थानो मे जीतती है परन्तु केवल ब्राह्मणो और दीनो से नहीं जीत पाती।