पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१५

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तिनपर चढ़िाये जे रिपु, केशव गये ते हारि । जिन पर चढ़ि आपुन गये, आये तिनहि सहारि ॥२३॥ सबलशाह अकबर अवनि, जीतिलई दिशि चारि । मधुकरसाहि नरेश गढ, तिन के लीन्हे मारि ॥२४॥ खान गनै सुल्तान को, राजा रावत बाद । हारथो मधुकरसाहि सों, आपुन साहिमुराद ॥२॥ साध्यो स्वारथ साथही, परमारथ सो नेह । गये सो प्रभु वैकुंठमग, ब्रह्मरन्ध्र तजि देह ॥२६॥ तिनके दूलहराम सुत, लहुरे होरिलराउ । रिपुखण्डन कुलमण्डनी, पूरण पुहुमि प्रभाउ ॥२७॥ रनरूरो नरसिह पुनि, रतनसेनि सुनि ईश । बांध्यो आपु जलालदी, बानो जाके शीश ॥२८॥ इन्द्रजीत, रणजीत पुनि शत्रुजीत बलबीर । बिरसिह देव प्रसिद्ध पुनि, हरिसिहौ रणधीर ॥२६॥ मधुकरसाहि नरेश के, इतने भये कुमार। रामसिह राजा भये, तिन के बुद्धि उदार ॥३०॥ घर बाहर वरणहि तहॉ, केशव देश विदेश । सब कोई यहई कहै, जीते राम नरेश ॥३१॥ रामसाहि सों शूरता, धर्म न पूजै आन । जाहि सराहत सर्वदा, अकबर सो सुलतान ॥३२॥ कर जोरे ठाढ़े तहाँ, आठौ दिशि के ईश । ताहि तहाँ बैठक दियो, अकबर सो अवनीश ॥३३॥ जाके दरशन को गये, उघरे देव किवॉर । उपजी दीपति दीप की, देखति एकहिबार ॥३४॥ ता राजा के राज अब, राजत जगती मॉह । राजा, रानी; राउ सब, सोवत जाकी छॉह ॥३५॥