पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१४३

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( १२८ ) 'जिस आकाश को वामन ने दो पैरो से ही नाप लिया था, उसे हम चार पैर वाले होकर क्या नापे' यह सोचकर घोडे पृथ्वी पर स्थिर रहते है। समुद्र ने ( जो हमारे पिता है ) समस्त पृथ्वी को घेर रखा है, तब हम क्या घेरें, यह सोच कर राजा के छत्र के नीचे ही, अपनी दौड छोडकर, इस तरह चचलता पूर्वक चक्राकार घूमते है कि मानो चाक को मोल लिए लेते है अर्थात् चाक से भी बढ कर घूमते है । जो मन के मित्र अर्थात् वेगमयी है, जो समीर (गयु ) के वीर-वाहन है अर्थात् अत्यन्त द्रुतगति वाले है, जो नेत्रो को बांधने के लिए रस्सी स्वरूप हैं अर्थात् जिन्हे देखकर आँखें उन्हीं को देखती रह जाती हैं और जो नेत्रो के प्रेम का स्थान है अर्थात् आँखें उनको प्रेम पूर्वक देखना चाहती है, जो गुणो ( शुभ लक्षणो) से युक्त और 'केशवदास' कहते हैं कि सुन्दर चाल चलने वाले है, ऐसे घोडो को श्रीरामचन्द्र जी दीनो को दिया करते है। गजवर्णन ( दोहा) मत्त, महावत हाथ में मन्दचलनि, चल कर्ण । मुक्तामय, इभकुभ शुभ सुन्दर शूर, सुवर्ण ॥२७॥ हाथी को मत्त ( मतवाला ), महावत के वश मे, धीमी चाल वाला, हिलते हुए कानो का, गज-मुक्ता युक्त, सुन्दर मस्तक का, शुभ, सुन्दर, शुर और सुवर्ण ( देखने मे अच्छा) होना चाहिए। उदाहरण कवित्त जल कै पगार, निज दल के सिगार, अरि, दल को विगारि करि, पर पुर पारै रौरि । ढाहै गढ़, जैसे घन, भट ज्यों भिरत, रन, देति देखि आशिष गणेश जू के भोरे गौरि ।