पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१४४

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( १२९ ) बिध के से बांधव, कलिदनंद से अमंद, बंदन कै सूड भरे, चन्दन की चारु खौरि । सूर के उदोत, उदै गिरि से उदित अति, ऐसे गज राज राजै राजा रामचन्द्र पौरि ॥२८॥ राजा रामचन्द्र जी की पौर ( दरवाजे ) पर ऐसे हाथी सुशोभित हो रहे है जो जल के पगार अर्थात् गहरे पानी को पैदल ही पार करने वाले, अपने दल की शोभा और बैरियो के दल को बिगाड कर उनके नगरो मे कोलाहल मचा देनेवाले है। वे दुर्गों को ढहा देने वाले है बादल जैसे ( काले ) है, युद्ध मे योद्धाओ की भाति लडते है और जिन्हे गणेशजी के धोखे मे, पार्वती जी आर्शीवाद दिया करती है। जो विन्ध्याचल पहाड जैसे ( ऊँचे ) है कलिन्द पहाड के पुत्र जैसे ( काले-काले ) है, सुन्दर है, जिनकी सूडे बदन । सिन्दूर ) से रगी हुई है। जिनके चन्दन की सुन्दर खौरे लगाई गई है और जो सूर्योदय के समय उदयाचल जैसे अति सुन्दर प्रतीत होते है। संग्राम वर्णन दोहा सेना स्वन, सनाह, रज, साहस, शस्त्रप्रहार । अंग-भंग, संघट्ट भट, अधकबन्ध अपार ॥२६॥ केशव बरणहु युद्ध मे, योगिनगणयुत रुद्र । भूमि भयानक रुधिरमय सरवर सरित समुद्र ॥३०॥ 'केशव' कहते है सग्राम का वर्णन करते समय सेना, कोलाहल, कवच, ( उडती हुई ) धूल, साहस, शस्त्रो का प्रहार, अङ्ग-भङ्ग, योद्धाओ का समूह, अन्धकार, सिर कटे हुए धड, योगिनियो के साथ रुद्र और रुधिरमय भयानक भूमि-आदि को तालाब, नदी, तथा समुद्र का रूपक देते हुए वर्णन करो।