पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१९

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रायप्रवीण प्रवीण सों, परवीणन वह सुख । अपरवीण केशव कहा, परवीणन मन दुख ॥५६॥ रतनाकर लालित सदा, परमानन्दहि लीन । अमल कमल कमनीय कर, रमा कि रायप्रवीन ॥५७|| राय प्रवीण कि शरदा, शुचि रुचि रंजित अग। वीणा पुस्तक धारणी, राजहॅस सुत सग ॥५८।। वृषभवाहिनी अंगयुत, वासुकि लसत प्रवीण । शिव सँग सोहति सर्वदा, शिवा कि रायप्रवीण ॥५॥ नाचत गावत पढत सब, सबै बजावत वीण । तिन मे करत कवित्त यक रायप्रवीण प्रवीण ॥६०॥ सविताजू कविता दई, जाकह परम प्रकास । ताके कारज कविप्रिया, कीन्ही केशवदास ॥६॥ राज्य का भली-भांति शासन प्रबन्ध करने के बाद इन्द्रजीतसिंह ने सगीत का अखाडा जमाया और वह उस अखाडे मे इन्द्र के समान ही आनन्द लेते थे। यद्यपि रूप, शील और गुण मे बढी हुई नवयुवती बालाओ से उनका अन्त पुर भरा हुआ था, परन्तु उनमे छ वेश्याये बहुत प्रसिद्ध थीं। उनमे ( पहली ) अत्यन्त चतुर प्रवीणराय, ( दूसरी ) सुन्दर वेशवाली नवरगराय, ( तीसरी) अत्यन्त निपुणा और कमल जैसे नेत्रवाली विचित्रनयना, ( चौथी ) राग के समुद्र की लहर के समान तानतरग, (पाँचवीं ) आनन्दमूर्ति रगराय तथा (छठवीं ) सर्वाङ्गसुन्दरी रंगमूर्ति थी। इनमे चतुर प्रवीण राय की वीणा देवसभा के समान प्रतीत होती थी, क्योकि जिस प्रकार देवसभा तत्री ( वृहस्पति ) तु दुरु गन्धर्व, सारिका अप्सरा और शुद्ध ( सत्वगुणवाले ) देवताओ से रक्त रहती है उसी प्रकार उसकी वीणा भी तत्री (वार), बुर (तूंबा), सारिका (घोरिया) और शद्ध स्वरो से युक्त है। रायप्रवीण सत्या ( सत्यभामा ) के समान है, क्योकि जिस प्रकार उसके घर