पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१९०

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( १७५ ) तीन सूचक दोहा गंगामग गंगेश हग, ग्रीवरेख गुण लेखि । पावफ, काल, त्रिशूल, बलि, संध्या तीनि विशेखि ॥८॥ पुष्कर विक्रम राम, विधि, त्रिपुर, त्रिवेनी, वेद । तीनिताप, परिताप, पद, ज्वरके तीनि सुखेद ॥६॥ गगा जी के ( तीन ) मार्ग, श्री शिव जी के ( तीन ) नेत्र, गर्दन की (तीन) रेखाएँ, गुण सत्व, रज और तम ), अग्नि काल ( भूत, वर्तमान भविष्य , त्रिशूल, बलि ( त्रिबली ), सध्या । प्रात , मध्यान्ह और साय ) पुष्कर (के तीन-वृद्धपुष्कर, शुद्धनाथ और ज्येष्ठ कुंड), राम परशुराम श्रीरामचन्द्र और बलराम , विधि वेद विधि, लोक विधि, कुलविधि ) त्रिपुर, त्रिवेणी गङ्गा, यमुना सरस्वती । वेद ( ऋक, यजु, साम ; ताप दैहिक, दैविक, भौतिक , परिताप ( मन परिताप, बल परिताप, वीर्य परिवाप ) और ज्वर के तीन (बात, पित्त, कफ) पैर ये तीन सख्या के चार सूचक दोहा वेद, वदन विधि, वारनिधि, हरि वाहन मुज चारि । सेना अंग, उपाय युग, आश्रम वर्ण विचारि ॥१०॥ सुरनायक वारनरदन, केशव दिशा बखानि । चतुर व्यूह रचना चमू , चरण, पदारथ जानि ॥११॥ 'केशवदास' कहते है कि वेद (ऋक, 'यजु, साम, अथर्व), ब्रह्मा के मुख, श्रीकृष्ण के रथ के घोडे, श्रीविष्णु की चार भुजाएँ, सेना के ( चार रथ हाथी, घोडा, पैदल ) अग, उपाय ( साम, दाम, दड, भेद ) युग ( सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग ) आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास), वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ), इन्द्र के हाथी ऐरावत के