पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२०२

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( १८५ ) तीन अर्थ का श्लेष ___ कवित्त परम विरोधी अविरोधी है रहत सब, ___ दानिन के दानि, कवि केशव प्रमान है। अधिक अनन्त आप, सोहत अनन्त संग, ____ अशरण शरण, निरक्षक निधान है। हुतभुक, हित मति, श्रीपति बसत हिय, गावत है गंगाजल, जग को निदान है। 'केशोराय' की सौ कहै 'केशौदास' देखि देखि, रुद्र की समुद्र की अमरसिह रान है ॥३१॥ पहला अर्थ श्रीरुद्र पक्ष मे जिनके यहाँ परम विरोधी (सिंह, बैल, साप मोर, चूहा-सॉप और अग्नि-जल) जीव और पदार्थ अविरोधी होकर (परस्पर प्रेम पूर्वक) रहते है । जो दानियो को दान देने वाले हैं अर्थात् देवताओ को भी वरदान देते है और जो केशव ( श्रीनारायण ) के सच्चे कवि है अर्थात् उनका गुणगान करते है । जो स्वय अनन्त से अधिक ( बडे ) है, परन्तु अनन्त ( शेष नाग ) के साथ रहते है । जो शरण हीनो की शरण है तथा अरक्षित जीवो के लिए ( सुख के ) निधान है। अग्नि के हित पर जिनकी बुद्धि रहती है अर्थात् जिन्हे यज्ञादि अच्छे लगते हैं और जिनके हृदय मे श्रीपति श्रीविष्णु ) रहते है जिन्हे गगाजल अच्छा लगता है तथा जो ससार के जीवो की शरण है। ईश्वर की शपथ, केशवदास देख देखकर कहते है कि यह रुद्र है, समुद्र है या अमर सिंह राना है।