पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२०७

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५. १९० ) मानसिक पुत्रो के गुणो ( शास्त्र सबधी वाद विवाद आदि ) को सुन कर सुख पाते है । अथवा जो हसावतार श्रीनारायण और अपने मानसिक पुत्रो के गुणो को सुनकर सुखी होते है । सगीत ( साम वेद आदि ) के मित्र है और जो विशेष बुद्धिमान कहे जाते है अथवा जिनकी प्रशसा विवुध ( देवता ) गण करते हैं । सुख देने वाली शक्ति (श्रीसरस्वती जी ) के घर है , और कामदेव के स्नेही अर्थात् सखा है तथा बहुत मुख वाले है । उनका यश सभी को विदित है और वह 'केशव' (श्रीनारायण भगवान् ) के दास है , इसलिए उनके गुण गाया करते है । उनके सुन्दर चरण द्विजराज ( पक्षियो के राज-हस ) पर सुशोभित होते है और उनका आसन कमल है और जिन्हे ब्रह्माणी जी प्रिय है । ऐसे श्री ब्रह्मा जी है । दूसरा अर्थ त्रिलोकीनाथ श्रीकृष्ण के पक्ष मे जिन्हे हंस-जात ( सूर्य से उत्पन्न ) यमुना जी परम प्यारी लगती है , इसीलिए उनके गुणो को सुनकर उन्हे सुख मिलता है । वह सगीत के मित्र है तथा देवतागण उनकी प्रशसा करते है । जो सुखदायिनी शक्ति श्रीराधिकाजी के साथ रहने वाले है और कामदेव के मित्र है । जिन्होने रास रचते समय बहुत से शरीर धारण किये थे, यह बात सभी लोगो को विदित है 'केशव' कहते है कि जिनका यश दास (भक्त लोग) बखानते रहते है । अथवा 'केसवदास' कहते है कि उनके विदित यश का वर्णन अनेक मुखो द्वारा होता रहता है । जिनके हृदय पर द्विजराज ( ब्राह्मण वर ) भृगु का चरण सुन्दर भूषणवत् सुशोभित होता है । जो श्रेष्ठ नारियो के प्रत्यक्ष साथी है और जिन्हे परनारियाँ प्रिय है। इन गुणो से युक्त त्रिलोक नाथ श्रीकृष्ण को समझाना चाहिए।