पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२१७

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( २०० ) उदाहरण-६ सवैया सखि सोहत गोपसभा महि गोविन्द बैठे हुते द्युतिको धरिकै । जनु केशव पूरणचन्द्र लसै चित चारु चकोरनिको हरिके ॥ तिनको उलटोकरि आनि दियो केहु नीर नयो भरिकै । कहि काहेते नेकु, निहार मनोहर फेरि दियो कविता करिकै ॥४६॥ ( केशवदास किसी सखी की ओर से कहते हैं कि है सखी । श्रीकृष्ण गोपो की मडली मे, शोभा धारण किए हुए बैठे थे । वह ऐसे ज्ञात हो रहे थे मानो चकोरो का मन हरण करता हुआ पूर्ण चन्द्रमा सुशोभित हो रहा हो । इसी बीच मे, किसी ने उसको कमल के पुष्प मे पानी भरकर उलटा करके, दे दिया। श्रीकृष्ण ने उसकी ओर तनिक देखा और उस कमल को काली जैसा करके । खिले हुए फूल को, बन्द करके ) लौटा दिया । बता, क्यो? - [कमल पुष्प लाने वाले का तात्पर्य यह था कि वियोगिनी अपना कमल-मुख लटकाये हुए, आपके विरह मे रो रही है । श्रीकृष्ण ने, कमल को कली बनाकर यह सकेत किया। कि जब कमल सकुचित हो जाते है , तब रात मे मिलूंगा।] १४-लेशालंकार दोहा चतुराई के लेसते, चतुर न समझै लेस । बर्णत कवि कोविद सबै, ताको केशव लेस ॥४७॥ केशवदास कहते है जहाँ ऐसी गूढ चतुराई की जाय कि उसे चतुर लोग भी लेशमात्र न समझ पावें, वहाँ, उसे कवि लोग तथा विद्वान सभी 'लेश' अलकार कहा करते है ।