पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२१८

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( २०१ ) उदाहरण सवैया खेलत हैं हरि बागै बने जहँ बैठी प्रिया रतिते अतिलोनी । केशव कैसेहु पीठ में दीठि परी कुच कुकुम की रुचिरोनी। मातु समीप दुराइ भले तिन सात्विक भावन की गति होनी । धूरिकपूरकी पूरि विलोचन सँघि सरोरुह ओढ़ि उढ़ोनी ॥४८॥ श्रीकृष्ण बने-ठने हुए बाग मे खेल रहे थे और उनकी रति से भी सुन्दर प्रिया वहीं बैठी हुई थी। 'केशवदास' कहते है कि किसी प्रकार उसकी दृष्टि उनकी पीठ पर लगे हुए, निज कुचकुंकुम की रमणीय चमक पर जा पडी । माता के समीप होने के कारण उसने अपने सात्विक भावो ( ऑसू, कम्प तथा रोमाच को भली-भॉति छिपा लिया। आँसुओ को छिपाने के लिए कपूर की चूल आँखो मे छोड ली, कम्प छिपाने के लिए कमल को सूंघने लगी (जिससे ज्ञात हो कि कमल की सुगन्ध की प्रशसा मे सिर हिल रहा है , और रोमाच को छिपाने के ओढनी को अच्छी तरह से ओढ लिया। [प्रणय-कलह के समय श्रीकृष्ण ने प्रिया की ओर से पीठ दी थी। नायिका ने प्रेम-वश, पीछे से हो उनके मुख का चुम्बन किया था, अत. उसके कुचो का कुंकुम उनकी पीठ पर लग गया था उसी को देखकर नायिका को सात्विक भाव उत्पन्न हुए और उसने उन्हे चतुराई से छिपा लिया। १५-निदर्शना दोहा कौनहुँ एक प्रकारते, सत अरु असत समान । कहिये प्रकट निदर्शना, समुभत सकल सुजान ॥४६॥