पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२२०

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( २०३ ) केशवदास कहते है कि जहाँ सहायता के घटने पर भी ( अर्थात् सहायहीन होने पर भी) स्वाभिमान को न छोडा जाय, वहाँ सभी श्रेष्ठ कविगण 'ऊर्ज' अलकार कहते है । उदाहरण सवैया को बपुरो जो मिल्यो है विभीषण है कुलदूषण जीवैगो कौलों । कुम्भकरन मरथो मघवारिपु, तौह कहा न डरो यम सौलों। श्रीरघुनाथ के गातनि सुन्दरि जानसित कुशलात न तौलों। शाल सबै दिगपालनिको कर रावण के करवाल है जौलों ॥५२॥ (रावण मन्दोदरी से कहता है कि ) विभीषण जो रामचन्द्र से जा मिला है, वह बेचारा क्या है और वह कुलकलक जीवेगा ही कब तक ? कुम्भकर्ण और मेघनाथ भी जो मर गये, उसका भी मुझे शोच नहीं है मै तो यमराजो से भी नहीं डरता । हे सुन्दरी ! जब तक समस्त दिग्पालो को शालनेवाला खड्न मेरे हाथो मे है, तब तक श्रीरामचन्द्र जी के शरीर को कुशल मत समझ । १७-रसक्त अलकार दोहा रसवत होय सुजानिये, रसवत केशवदास । नब रसको सक्षेपही, समझो करत प्रकास ॥५३॥ 'केशवदास' कहते है कि किसी भी रस-मय वर्णन को रसवत अलकार समझिए । अथवा यह मानिए कि यह अलकार मानो नवो रसो का सक्षेप मे प्रकटीकरण है। उदाहरण शृङ्गार रसवत आन तिहारी, न आन कहो, तनमे कछु न न आनही कैसो । केशव स्याम सुजान स्वरूप न, जाय कमो मन जानतु जैसो॥