पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२३

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(१३)

तिनके पुत्र प्रसिद्ध जग, कीन्हे हरि हरिनाथ । तामरपति तजि और सो, भूलि न ओड्यो हाथ ॥१२॥ पुत्र भये हरिनाथ के, कृष्णदत शुभ वेप । सभा शाह सग्राम की जीती गढ़ी अशेष ॥१३॥ तिनको वृत्ति पुराण की, दीन्ही राजा रुद्र । तिनके काशीनाथ सुत, सो भे बुद्धिसमुद्र ॥१४॥ जिनको मधुकरशाह नृप, बहुत कियो सनमान । तिनके सुत बलभद्र बुध, प्रकट बुद्धिनिधान ॥१५॥ बालहि ते मधुशाह नृप तिनसों सुन्यो पुरान । तिनके सोदर द्वै भये, केशवदास कल्यान ॥१६।। भाषा बोलि न जानहीं, जिनके कुल के दास । भाषा कवि भो मंदमति, तेहि कुल केशवदास ॥१७॥ इन्द्रजीत तासों कह्यो, मांगन मध्य प्रयाग । मांग्यो सब दिन एक रस, कीजै कृपा सभाग ॥१८॥ योहीं कह्यो जु बीर बर, मांगु जु मन मे होय । माग्यो तव दरबार में, मोहिं न रोकै कोय ॥१६॥ गुरु कार मान्यो इन्द्रजित, तनमन कृपा विचारि । ग्राम दये इकबीस तब, ताके पायँ पखारि ॥२०॥ इन्द्रजीत के हेतु पुनि, राजा राम सुजान । मान्यो मन्त्री मित्र के, केशवदास प्रमान ।।२१।।

ब्रह्माजी के चित्त से सनकादि प्रकट हुए और उनके चित्त से -सनाढ्य ब्राह्मणो की उत्पत्ति हुई। ( अर्थात् ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र सनकादि थे और सनकादि के मानसिक पुत्र सनाय ब्राह्मण हुए ।भृगुनन्द परशुराम ने उन्हे उत्तम ब्राह्मण समझ कर पैर पखारे और ७२ गाँव दिये। जग-पावन वैकुठपति श्री रामचन्द जी ने मथुरा मण्डल में उन्हे ७०० गॉव प्रदान किये। फिर सोमवश के यदुकुल-श्रेष्ठ तथा त्रिभुवन पालक श्रीकृष्ण महाराज ने भी कलियुग मे उन्हे वही ( मथुरा