पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२४३

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। २२६ ) इस करील के वृक्ष मे कभी पत्ते नही देखे । यह बडा जाडा, घाम और वर्षा से कैसे बचावेगा? केशवदास कहते है कि जब दिन प्रतिदिन प्रचड वायु चलेगी और दावाग्नि जलेगी, तब तू कसे धैर्य धारण करेगा? जब तक यह फले फूलेगा नहों तब तक तू ही बता, तुझसे भूख कैसे सही जायगी ? इसमे न तो कुछ छाया है, न सुख है और न शोभा है, अत हे सुग्गे तू करील पर रहकर क्या करेगा? ( इसमे तोते को लक्ष्य करके, ऐसे व्यक्ति के प्रति सकेत किया गया है, जो किसी ऐसे व्यक्ति की सेवा करता है, जो साधन सम्पत्ति हीन है, अत उससे सुख पाना व्यर्थ है ) ३-व्याधिकरणोक्ति दोहा औरहि में कीजै प्रकट, औरहि को गुण दोष । उक्ति यहै व्यधिकरन की, सुनत होत सतोष ॥८।। जहाँ किसी और का गुण-दोष किसी और में प्रकट किया जाता है वहाँ व्याधिकरण उक्ति होती है, जिसे सुनकर सतोष होता है। उदाहरण (१) कवित्त जानु, कटि, नाभि कूल, कठ पीठ भुजमूल, उरज करज रेख रेखी बहु भाँति है। दलित कपोल, रद ललित अधर रुचि, रसना-रसित रस, रोस मे रिसाति है।