पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२५५

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( २३८ ) प्रीतमको पट क्यो पलट्यो ? अलि, केवल तेरी प्रतीति को ल्याई। केशव नीकेहि नायक सों रमि नायका बात नही बहराई ॥२७॥ मुंह पर हसीने को बूदे और हृदय मे सम्बी उसासें क्यो है ? इस लिए कि तेरे लिए दौडती हुई आई हूँ। तेरे मुख का राग सरलता से फीका कैसे पड गया ? क्योकि तेरे पति ने मुझे अनेक बार बकवाया है । मेरे प्रियतम का वस्त्र तुझसे कैसे बदल गया ? हे सखी इसे तो मै तेरे विश्वास के लिए लाई हूँ। 'केशवदास' कहते है इस तरह से उसके पति के साथ स्वय रमण करके, बेचारो नायिका को बातो ही बातो में बहला दिया। [इसमे जो सिद्धि नायिका को मिलनी चाहिए थी, वह उसकी सखी को मिल गई अतः अमित अलकार हे ] उदाहरण (२) सवैया को कनै कर्ण जगन्मणिसे नृप, साथ सबै दल राजनही को। जानै को खान किते सुलतानसो, आयो शहाबुदी शाह दिलीको । ओड़छे आति जुरथो कहि केशव, शाहि मधूकर सो शक जीको । दौरिकै दूलह राम सुजीति, करयो अपने शिर कीरति टीको ॥२८॥ जगत्मणि कर्ण से राजाओ को कौन गिने ? उसके साथ तो राजाओ का पूरा दल ही था। ज्ञात नहीं कितने खान और सुलतानो को साथ लेकर, दिल्ली का शहाबुद्दीन लडने आया था। 'केशवदास' कहते हैं कि जिससे राजा मधुकर शाह को अपने प्राणो की शका थो वहाँ शहाबुद्दीन ओछडे पर आकर डट गया। यह सुनते ही दूलहराम ने दौडकर उसे जीत कर अपने सिर कीर्ति का टीका ले लिया ।