पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२६६

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( २४९ ) उदाहरण-३ कवित्त शोभा सरवर मांहि फूल्यो ई रहत सखि, राजै राजहसिनि समीप सुख दानिये । "केशौदास" आस-पास सौरभ के लाभ घनी, ब्राननि की देवि भौरि भ्रमत बखानिये । होति जोति दिन दूनी, निशि मे सहस गुनी, सूरज सुहृद चारु चन्द्र मन मानिये । रति को सदन छूई सके न मदन ऐसौ, कमल-बदन जग जानकी को जानिये ॥१६॥ श्री जानकी जी का मुख-कमल ससार मे ऐसा है कि वह शोभा के सरोवर मे सदा फूला ही रहता है। उसके पास सखियाँ रूपी राजहसिनी आनन्द प्रदान करती रहती है । 'केशवदास' कहते है कि उसके आस-पास सुगन्ध के लोभ से, भ्रमरी रूपी ध्राण देवियाँ मडराया करती है। उसकी दिन मे दूनी और रात मे सहस्त्र गुणी कॉति बढ जाती है क्योकि (दिन मे सूर्य और रात मे श्री राम ) चन्द्र उसके सुहृद होते है। इसको मन मे सच्चा समझिये। वह रति का सदन है, परन्तु मदन । कामदेव उसे छू भी नहीं सकता। २-विरुद्ध रूपक दोहा जहँ कहिये अनमिल कछू, सुमिल सकल विधि अर्थ । सो विरुद्ध रुपक कहत, केशव बुद्धि समर्थ ॥१७॥ 'केशवदास' कहते है कि जहाँ पर अर्थ के सब प्रकार के सुमिल होने पर भी कुछ अनमिल (जो न मिलता हो ) कहा जाय, वहाँ समर्थ बुद्धि वाले 'विरुद्ध' रूपक कहते है।