पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२८६

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( २६९ ) ८-मोहोपनमा दोहा रूपक के अनुरूप ज्यो, कौनहु विधि मन जाय । ताहीसों मोहोपमा, सकल कहत कविराय ॥१॥ जहाँ रूपक अर्थात् उपमेय को किसी प्रकार अनुरूप ( उपमान ) समझ लिया जाय उसे सभी महाकवि लोग मोहोपमा कहते है। उदाहरण कवित्त खेल न खेल कळू, हांसी न हॅसत हरि, सुनत न गान कान तान बान सी बहै । ओढ़त न अबरन, डोलत दिगंबर सो, शबर ज्यों शबरारि दुख देह को दहै। भूलिहू न सूधै फूल, फूल तूल कुम्हिलात, गात, खात बीरा हू न बात काहू सो कहै । जानि जानि चदमुख केशव चकोर सम, चंदमुखी चंद ही के बिव त्यों चितै रहै ॥२०॥ (एक सखी नायिका से कहती है कि ) हे चन्द्रमुखी । श्रीकृष्ण न तो कोई खेल खेलते है, न हॅसी ही करते हैं, न गान ही सुनते हैं क्योकि गाने की तान तो उनके कानो मे बारण सी लगती है। वह कपडे भी नहीं ओढते, दिगम्बर ( नगे ) से घूमा करते है और शबरारि ( काम ) पीडा तो उनको उसी प्रकार उनके शरीर को कष्ट देती है जैसे स्वय काम ने शङ्कर को कष्ट दिया था। वह भूलकर भी फूल नहीं सूघते, क्योकि फूल के समान शरीर उसके सँधने से मुझ जाता है। वह पान भी नहीं खाते और न किसी से बातें करते है। 'केशवदास' ( सखी की ओर से) कहते हैं कि वह तेरे मुख