पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२९८

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( २८० ) उदाहरण कवित्त जैसे अति शीतल सुबास मलयज माहि, अमल अनल बुद्धिबल पहिचानिये । जैसे कौनो काल वश, कोमल कमल माहि, कैशरैई 'केशौदास' कटक से जानिये । जैसे विधु सधर मधुर मधुमय माहिं, मोहै मोहरुख, विष विषम बखानिये । सुन्दरि, सुलोचनि, सुवचनि, सुदति तैसे, तेरे मुख आखर परुख रुख मानिये ॥४०॥ जिस प्रकार अत्यन्त शीतल और सुगन्धमय चन्दन मे बुद्धिबल से अग्नि पहचानी जाती। केशवदास कहते है जिस प्रकार किसी कालवश ( विरह के समयाधीन ) को कोमल कमल मे केसर भी कांटो जैसी जान पड़ती है, जैसे पूर्ण चन्द्रमा को मधुर तथा मधुमय होते हुए भी मोह से मोह रुख ( मूर्छा से मूर्छित प्राय ) विषय विषमय ( कठोर विष से भरा ) कहा करता है, उसी प्रकार हे सुन्दरी, सुलोचनी तथा सुन्दर दांतो वाली, तेरे मुख मे कठोर वचनो को मानना चाहिये अर्थात् ऊपर लिखी बाते असम्भव है उसी प्रकार तेरे मुख मे कठोर बचनो का होना असम्भव है। १६-विरोधोपमा दोहा जह उपमा उपमेयसों, आपस माहि विरोध । सों विरोध उपमा सदा, बरणत जिनहि प्रबोध ॥४१॥ जहाँ उपमा और उपमेय मै आपस का विरोध प्रदर्शित किया जाय वहाँ उसे जानकार लोग सदा विरोधोपमा कहते है !