पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२९९

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( २८१ ) उदाहरण कवित्त कोमल कमल, कर कमला के भूषण को, 'केशौदास' दूषण शरद शशिठाई है । शशि अति अमल अमृतमय मणिमय, सीता को बदन देखि ताको मतिनाई है। सीता को बदन सब सुख को सदन, जाहि, महत मदन, दुख कदन निकाई है। आधो पल माधो जू के देखे बिनु सोई शशि, सीता के बदन कह होत दुखदाई है ॥४२॥ 'केशवदास' कहते है कि कमला ( श्री लक्ष्मी जी ) के भूषण स्वरूप कोमलकरो के लिए शरद ऋतु का चन्द्रमा दूषण स्वरूप ही है। चन्द्रमा अत्यन्त निर्मल, अमृत पूर्ण, तथा काति वाला है, परन्तु फिर भी श्री सीता जी के मुख को देखकर उसमे मलिनता आ जाती है। श्री सीताजी का मुख सब सुखो का घर है, जिसे देखकर काम भी मोहित हो जाता है तथा दुखो को दूर करने वाली जिसकी शोभा है वही चन्द्रमा श्री रामचन्द्र को आधे पल के लिए भी बिना देखे, सीता जी के मुख को दुखदाई हो जाता है । २०-मालोपमा दोहा जो जो उपमा दीजिये, सो सो पुनि उपमेय । सो कहिये मालोपमा केशव कविकुल गेय ॥४३॥ 'केशवदास' कहते है कि जहाँ उपमान, उपमेय और उपमेय, उपमान बनते चले जॉय वहाँ उसे कवि लोगो के द्वारा 'मालोपमा' कहा जाता है।