पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३०७

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( २८९ ) हे मानिनी । तुझे तेरा प्राण प्यारा स्वय मना रहा है, देख और मान जा । हरि (श्रीकृष्ण) को सुजान जानकर अपने चित्त मे इसका विचार कर। [ इसमे 'माननि-माननि', तथा 'सुजान' मे यमक है। एकपादान्त है, दूसरा पादादि] द्विपादांत यमक दोहा जिन हरि जगको मन हरथो, बाम बानहग चाहि । मनसा वाचा कर्मणा, हरि बनिता बनि ताहि ॥१२।। हे वाम ! जिन हरि (श्रीकृष्ण ) ने वाम दृग ( तिरछी दृष्टि ) से देखकर सारे ससार का मन हर लिया है, उन हरि की तू मन, वचन और कर्म से बनिता ( स्त्री ) बन जा। [इसमे 'बाम-बाम' तथा 'बनिता बनिता' मे यमक है ] उत्तराद्ध यमक दोहा आजु छबीली छबि बनी, छांडि छलिन के सग । तरुनि, तरुनि के तर मिलौ, केशव के सब अंग ॥१३॥ आज (श्रीकृष्ण) की शोभा अच्छी बनी है। अतः छलियों का सग छोडकर, हे तरुरिण। वृक्षो के नीचे, श्रीकृष्ण के सब अगो से लिपट कर मिल। [इसमे उत्तराई के दोनो चरणो मे 'तरुनि तरुनि' तथा 'केशव' केशव मे यमक है]