पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३०९

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( २९१ ) [ इसमे 'सूरजु-सूरजु', 'रमणी-रमणी' तथा 'रति-रति' में यमक है। चतुष्पाद यमक दोहा नही उरबसी उरबसी, मदत मदन वश भक्त । सुर तरुवर तरुवर तजै, नद-नंद आसक्त ॥१७॥ जो भक्त होते हैं, उनके मन मे उरवसी वास नहीं करती और न वै काम के नशे के वश में होते है । जो नन्द-नन्द ( नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण) पर आसक्त रहते है वे कल्पवृक्ष को भी साधारण वृक्ष की भाँति छोड़ [ इसके चारों पदो में यमक है ] दोहा अब्ययेत जमकनि सदा, वरणहू इहि विधिजान। करो व्ययेत विकल्पना, जमकनिकी सुखदान ॥१८॥ अव्ययेत यमको सदा इसी तरह से वर्णन करना चाहिए । अब मैं व्ययेत यमको का आनन्ददामी वर्णन करता हूँ। सव्ययेत यमक दोहा माधव सो धव राधिका, पावहु कान्हकुमार। पूजौ माधव नियम सों, गिरिजा को भरतार ॥१॥ हे राधिका । यदि तुम इस बात की अभिलाषा करती हो कि तुम्हे माधव (विष्णु) के समान श्रीकृष्ण पति रूप मे मिले वो नियम से वैशाख मास मे श्री शङ्कर जी को पूजो।