पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३१

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'देशविरोध', 'काल विरोध', 'लोकविरोध', न्याय और आगम (शास्त्र) के विरोधो को भी विचारपूर्वक छोड दो। (१) गनागनफल वर्णन । केशव गन शुभ सर्वदा, अगन अशुभ उरानि । चारिचारि विधि चारु मति, गन अरु अगन बखानि ॥१८॥ 'केशवदास' कहते हैं कि गण ( सुगण ) सर्वदा शुभ माने जाते हैं और 'अगण' । कुगण ) को सदा अशुभ समझना चाहिये । बुद्धिमानो ने 'गण' और 'अगरण' को चार-चार तरह का बतलाया है। गनागन नाम वणेन । मगन, लगन, पुनि भगन, अरु यगन, लढा शुभ जानि । जगन, रगन अरु सगन पुनि, तानहि अशुभ बखानि ॥१६॥ 'ममण', 'नगण', "भगण' और 'यगण' इन्हे सदा शुभ समझा जाता है और 'नगरण', 'रगरण', 'सगरण', तथा 'तगण' को अशुभ माना गया है। गनागनरूप वर्णन। मगन त्रिगुरुयुत त्रिलघुमय, केशव नगन-प्रमान । भगन आदिगुरु आदिलघु, यगन बखानि सुजान ॥२०॥ 'केशवदास' कहते हैं कि तीनो गुरु अक्षरो से युक्त 'मगण' और तीनो लघु अक्षरो वाला 'नगण' कहलाता है। जिसके आदि में गुरु होता है उसे 'भगरण' तथा जिसके आदि मे लघु होता है उसे 'यगण' कहते है । जगन मध्यगुरु जानिये, रगन मध्यलघु होइ। सगन अंतगुरु अंतलघु, तगन कहत सब कोइ ॥२१॥ जिसके मध्य मे गुरु हो उसे 'जगण' और जिसके मध्य मे लघु हो उसे 'रगण' समझिए । इसी प्रकार जिसके अंत में गुरु होता है उसे "सगर और जिसके अंत में लघु होता है उसे 'तगए' कहते है।