पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३१६

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( २९८ ) पुनः-२ जैसे रचै जय श्री करवालहि । ज्यों अलिनी जलजात रसालहि । ल्यों बरषा हर बिन कालहि । त्यों हग देखन चहत गुपालहि ॥३॥ सवैया स्यदन हांकत होत दुखी दिन दूरि करै सबके दुखददन । छंदनि जानी नहीं जिनकी गति नाम कहावत है नॅदनंदन ।। फंदनपंडुके पूतनिकी मति काटि करै मनमोह निकंदन । चदनचेरीके अंग चढ़ावत देव अदेव कहैं जगबंदन ॥३८॥