पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३१७

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सोलहवां प्रभाव ३७-चित्रालंकार दोहा केशव चित्र समुद्र में, बूडत परम विचित्र । ताके बूंढक के कणे, बरनत हौं सुनि मित्र ॥१॥ 'केशव दास' कहते हैं कि चित्रालकार के समुद्र में बड़ी अद्भुत प्रतिमा वाले भी गोता खाने लगते हैं । हे मित्र | सुनो, मै उसी समुद्र की एक बूद के एक कण का वर्णन करता हूँ। दोहा अधऊरध बिन बिदुयुत, जति, रमहीन, अपार । बधिर, अंध, गन अगन को, गनियन नगन विचार ॥२॥ इन चित्रालकारो में, विसर्ग अनुस्वार, यति भग, रसहीनता, बधिर, अध तथा गण अगण का विचार नहीं किया जाता । दोहा केशव चित्रकवित्त मे, इनके ढोप देख । अक्षर मोटो पातरो, बव जय एको लेख ॥३॥ 'केशवदास' कहते हैं कि चित्रालकार युक्त रचनाओ मे इन दोषो का विचार न कीजिए। ( इतना ही नहीं, यदि आवश्यकता पडे तो ) दीर्घ अक्षर को लघु, मान लीजिए तथा 'ब' और 'व' एव 'ज' और 'य' को एक ही समझिए।