पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३१९

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( ३०१ ) देखि देखि हरि की हरनता हरिन नैनी, देखत ही देखा नही दियो हरि लेत हैं ॥६॥ हे सखी । श्रीकृष्ण लोक मर्यादा तथा लज्जा को छुडा देते हैं । उनके सुन्दर नेत्र है तथा वह लीला के घर हैं ? न तो उन्हे शपथ खाने का कुछ शोच है और न सासारिक निदा हो का कुछ ध्यान है । जो उन्हे सुख देता है उसे वह दूना दुख देते हैं । केशवदास (उस सखी की ओर से ) कहते है कि श्रीकृष्ण कन्हेर के फूल को भॉति बाहर रङ्गबिरङ्ग और भीतर सफेद है । अर्थात् उनका बाहर-भीतर एक सा नहीं है। मन मे कुछ रखते है और ऊपर दूसरा व्यवहार करते हैं। हे हरिण नैनी । श्रीकृष्ण की हरण करने की शक्ति तो देख । वह देखते ही देखते क्या हृदय को हरण नहीं कर लेते? २-मात्रारहित वर्णन दोहा एकैस्वर जहँ बरणिये, अद्भुतरूप अवर्ण । कहिये मात्रारहित जह, मित्र चित्र आभर्ण ॥७॥ हे मित्र । जहाँ किसी रचना मे केवल एक ही स्वर 'अ' का अद्भूत रूप से प्रयोग किया जाता है, वहां उसे मात्रा रहित चित्रालकार कहते हैं। उदाहरण कवित्त जग जगमगत भगत जन रस बस, भव भयहर कर, करत अचर चर । कनक बसन वन, असन अनल बड़, बटदल बसन, सजलथल थलकर ।