पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३२०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( ३०२ ) अजर अमर अज बरद चरन धर, परम धरम गन, वरन शरन पर। अमल कमल वर वदन, सदन जस, हरन मदन मद, मदन-कदन हर ॥८॥ जो भक्तो की भक्ति के वश में होकर जग मे जगमगाते रहते हैं अर्थात् भक्तों का कष्ट दूर करने के लिए ससार मे अवतरित होकर शोभा धारण करते है। जो ससार के भय को दूर करके, अचर को चर करने वाले है। जो शरीर पर कनक अर्थात् सोने के रंग का कपड़ धारण करते हैं, जिन्होने बडी भारी अग्नि को भोजन बना डाला अर्थात् दावाग्नि को पी गये । जो वट के पत्ते पर निवास करते है तथा जिन्होंने समस्त पृथ्वी को सजल अर्थात् जलमय कर दिया था। चिरजीव देवता गण तथा श्री ब्रह्माजी एव श्रीशकर जी जिनके चरण छूते है। जो अत्यन्त धर्म परायणो को शरण देने वाले हैं । जिनका निर्मल कमल जैसा श्रेष्ठ मुख है, जो कीर्ति के घर हैं, जो अपनी सुन्दरता से काम- देव के गर्व को भी हरण कर लेते हैं, ऐसे काम के नाश को दूर करने वाले अर्थात् काम को (प्रत्रुम्न के रूप में) पुन. उत्पन्न करने वाले श्रीकृष्ण हैं। ४-एकाक्षर रचना दोहा एकादिक दै वर्ण बहु, वौँ शब्द बनाय । अपने अपने बुद्धिबल, समुझत सब कविराय ॥६॥ एक से लेकर दो, तीन, चार आदि अनेक वर्षों की रचना की जा सकती है। कवि सम्राट अपने अपने बुद्धिबल से उसे समझ लेते हैं।