पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३२२

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( ३०४ ) -चतुराक्षर रचना कवित्त सीतानाथ, सेतुनाथ, सत्यनाथ, रघुनाथ, जगनाथ, ब्रजनाथ, दीनानाथ, देवगति । देवदेव यज्ञदेव, विश्वदेव, व्यासदेव, वासुदेव, वसुदेव, दिव्यदेवहीन रति । रणवीर, रघुवीर, यदुवीर, ब्रजवीर, बलवीर, वीरवर, रामचन्द्र, चारुमति । राजपति, रमापति, रामापति, राधापति, रसपति, रसापति, रासपति, रागपति ॥१३॥ दोहा अक्षर षटबिसति सबै, भाषा बरनि बनाव । एक एक घटि एक लगि, केशवदास सुनाव ॥१४॥ 'केशवदास' कहते है कि अब मै छब्बीस वर्षों के दोहे से बारम्भ करके, एक एक वर्ण घटते हुए एकाक्षर तक की रचना सुनाता हूँ। छब्बीस वर्ण की रचना दोहा चोरीमाखन दूध, ध्यो ढूँढ़त हठि गोपाल । डरो न जल थल भटकि फिरि झगरत छवि सो लाल ॥१५॥ कोई गोपी श्री कृष्ण से कहती हैं कि हे गोपाल | तुम मक्खन, दूध और घी की हठपूर्वक चोरी करने के लिए, जल, स्थल सभी जगह भटकते फिरते हो और डरते नहीं। साथ ही बडी छवि से अर्थात् बड़े अभिमान से लडने को भी उद्यत होते हो।