पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३२४

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इक्कीस वर्ण की रचना सवैया जैसे तुम सब जग रच्यो, दियो काल के हाथ । तैसे अब दुख कादि, करमफन्द दृढ़ नाथ ॥२०॥ जैसे आपने सारी सृष्टि रचकर, काल के हाथ मे ( नाश करने के लिए ) दे दी है, वैसे ही, हे नाथ । मेरे दुःखो तथा कर्म फदो को भी काट दीजिए। बीस अक्षर की रचना दोहा थके जगत समुझाय सब, निपट पुराण पुकारि । मेरे मनमे चुभि रहे, मधुमर्दन मुरहारि ॥२१॥ जगत के सब लोग मुझे समझा समझा कर हार गये और पुराण भी पुकार पुकारकर रह गये, परन्तु मेरे मन में तो मधुराक्षस को मारनेवाले तथा मुरारि ( श्री कृष्ण ) हो चुभे हुए है । ___ उन्नीस अक्षर की रचना दोहा को जाने को कहिगयो, राधा सो यह बात । करी जु माखनचोरि वलि, उठत बड़े प्रभात ॥२२॥ पता नहीं, राधा से यह बात कौन कह गया कि मै बलि जाऊँ, बड़े प्रातः उठते हो मैने देखा है कि किसी ने तुम्हारे यहाँ मक्खन को चोरी की है।' अठारह अक्षर की रचना दोहा यतन जमारो नेहतर, फूलत नन्दकुमार । खंडत कस कत जो न अव, कपट कठोर कुठार ॥२३॥