पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३४

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मित्र गण के साथ यदि मित्र गण हो तो ऋद्धि-सिद्ध बढती हैं । 'मित्र गण' के साथ 'दास गण' होने पर युद्ध मे त्रास नहीं होता। हारना नहीं पडता) । मित्र गण के साथ उदासीन गण आवे तो गोत्र या कुटुम्ब को दुख देते हैं और जो मित्र गण तथा शत्रु गण साथ हो तो बन्यु-हानि होती है । 'केशवदास' कहते है कि यदि दास गण और मित्र गरण साथ पडे तो कार्य सिद्ध होता है और जो दास गरण साथ-साथ पडे तो सभी जीवो को वश मे कर लेते है। यदि 'दास गण और "उदासीन गण' साथ-साथ हो तो आस-पास धन का नाश होता है तथा 'दास-गण' और शत्रु गण के एक साथ होने पर मित्र भी शत्रु जैसा हो जाता है।

               कवित्त
   जानिये उदास ते जु मित्र गन तुच्छ फल,
      प्रगट उदास तें जु दास प्रभुताइये।
   होइ जो उदास ते उदास तो न फलाफल,
      जो उदास ही ते शत्रु तो न सुख पाइये ।।
   शत्रु तें जु मित्रगन ताहि सो अफलगन,
      शत्रु ते जु दास आशु बनिता, नसाइये।
   शत्र ते उदास कुल नाश होय केशौदास,
      शत्रु ते जु शत्रु नाश नायक को गाइये ॥२६॥

यदि 'उदामोन गण' और 'मित्रगण' साध हो तो तुच्छ फल समझो। 'उदासीन गण' और 'दास गण' के मेल से प्रभुता प्राप्त होती है । यदि उदासीन गण साथ-साथ हो तो फलाफल कुछ नहीं होता और जो उदासीनगण तथा 'शत्रु गरण' का साथ हो ता सुख नहीं मिलता। जो 'शत्रुगण और 'मित्रगण' एक साथ हो तो विफल होते है और यदि शत्रुगण का 'दास गरण' के साथ मेल हुआ तो शीघ्र ही स्त्री का माश हो जाता है। 'केशवदास' कहते है कि 'शत्रुगण' और 'उदासीन