पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३४९

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( ३३१ ) चरणगुप्त दोहा इन्द्रजीत संगीतलै, किये रामरस लीन । क्षुद्रगीत संगीतलै, भये कामबस दीन ।।७७॥ चरणगुप्त चक्र hot | जी स त | किरा र ली द्र | त गी लै ये म स । न क्षु | गी| स त । भ का व | दी [इसमे दोहे का एक चरण लुप्त सा हो जाता है। बीच वाली पक्ति पर तथा नीचे वाली दोनो पक्तियो से मिल जाती है ] गतागत चतुर्पदी रा का राज मा । स | मा | स राधा मी त | सा | ल । सी । सु । राकाराज जराकारा मासमास-समासमा ॥ राधाम त-तमीधारा-सालसीसु-सुसीलसा ॥८॥ ( वियोग मे ) राकाराज (पूनो का चाँद ) जराकारा (ज्वर जैसा) मास-मास तथा वर्ष, वर्ष प्रतीत होता है। मति राधा को भी अर्थात् रात, धारा (तलवार की धार) की भाँति शिर पर शालती