पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३५३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( ३३५ ) [ इनमें 'नवरङ्गराय प्रवीन' चरणगुप्त हो जाता है और १, २, ३,४ आदि अको द्वारा सूचित अक्षरो को जोडकर पढने से प्रकट हो जाता है] चक्रवन्ध (दोहा) मुरलीधर मुख दरसि मुख, संमुख मुख श्रीधाम । सुनि सारस नैनी सिखे, जी सुख पूजै काम ॥२॥ KAREI644304 का जे tar सर्वतोभद्र कामदेव चित्त दाहि, वाम देव मित्त दाहि । रामदेव चित्त चाहि, धाम देव नित्त ताहि ॥३॥ कार HA इसको कामधेनु भी कहते हैं