पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/४१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
२९

रहूँगी' इस पर श्रीकृष्ण बोले कि 'तो बैर करके गोरस बेचोगो ?' तब गोपी ने उत्तर दिया कि 'यदि न बेच पाऊँगी तो फेक न दूंगी। अर्थात् न बेच सकूँगी तो अपने काम मे लाऊँगी, तुम्हे न दूँगी । [ इस उदाहरण मे शृंगार रस का आभास होने पर भी उपूण परिपाक नहीं हुआ है । केवल मनोरजक वार्तालाप मात्र है । अनुभाव तथा सचारी भाव कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते, अत: इसमे हीन-रस दोष है। ] (३) यति-भग दोष और चरण के बरण जह, और चरण सो लीन । सो यतिभग कवित्त कहि, केशवदास प्रवीन ॥४०॥ जहां किसी एक चरण के अक्षर कटकर दूसरे चरण मे चले जायें वहाँ 'केशवदास' असे यतिभग पूर्ण कवित कहते है अथवा 'केशवदास' कहते है कि हे प्रवीनराय | यह यति-भग पूर्ण कवित्त कहलाता है। उदाहरण दोहा हर हरि केशव मदन मो, हन घनश्याम सुजान । ' यों ब्रजवासी द्वारका, नाथ रटत दिनमान ॥४१॥ अजवामी गण दिन-रात 'हर-हरि' केशव', 'मदनमोहन', 'घनश्याम', 'सुजान' और 'द्वारिकानाथ' रटा करते हैं । ( इसमे 'मदनमोहन, का 'मदनमो' एक ओर आ गया है और 'हन' दूसरी ओर चला गया है। इसी तरह 'द्वारिकानाथ' के भी दो भाग हो गये है । 'द्वारका' एक हो गया है ओर 'नाथ' दूसरी ओर । अत यति-भग दोष है) (४) व्यर्थ दोष कि कवित्त प्रबन्ध मे, अर्थ विरोध जु होय । पूरन पर अनमिल रादा, व्यर्थ कहै लब कोय ॥४२॥ जब एक ही कवित्त मे अर्थ विरोध हो और पूर्वा पर अनमिल हो अर्थात् पूर्वापर ठीक-ठीक बैठता न हो, तब सब लाग उसे व्यर्थ दोष कहते है।