पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/४७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
चौथा-प्रभाव

चौथा-प्रभाव कवि-भेद वर्णन दोहा केशव तीनहु लोक में, त्रिविध कविन के राय । मति पनि तीन प्रकार की, बरनत सब सुख पाय ॥१॥ उत्तम, मध्यम, अधम कवि, उत्तम हरि-रस लीन । मध्यम मानत मानुषनि, दापनि अधम प्रवीन ॥२॥ 'केशवदास' कहते है कि तीनो लोको मे तीन प्रकार के कवि होते है । साथ ही सब लोग बुद्धि को भी तीन प्रकार को बतलाते है । वे तीनो प्रकार के कवि (१) उत्तम (२) मध्यम और (३) अधम कहलाते है । इनमे से जो उत्तम कवि होते हैं वे परमात्मा के यश में लीन रहते है अर्थात् ईश्वर के मुणो का गान अपनी कविता मे किया करते है । जो मध्यम होते हैं, वे मनुष्यो के चरित्रो का वर्णन करते है और जो अधम होते हैं वे दूसरो के दोषो का ही बखान करते रहते है। उदाहरण सवैया जो अति उत्तम ते पुरुषारथ, जे परमारथ के पथ सोहै। केशवदास अनुत्तम ते नर सतत स्वारथ संयुत जो हैं। स्वारथ हू परमारथ भोगनि मध्यम लोगनि के मन मोहै। भारत पारथ-मीत कही, परमारथ स्वारथहीन ते को है ॥३॥ 'केशवदास' कहते है कि जो कवि परमार्थ के पथ पर चलते है, वे अत्युत्तम अर्थात् प्रथम श्रेणी के है । जो सदा स्वार्थ मे लोन रहते है वे