पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/५७

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पांचवाँ-भाव काव्यालङ्कार दोहा यदपि सुजाति सुलक्षणी, सुवरनसरस सुवृत्त । भूपण बिन न विराजई, कविता वनिता मित्त ॥१२॥ हे मित्र | कविता यद्यपि सुजाति । उच्चकोटि की ), सुलक्षण अच्छेलक्षणो वाली ) सुवानसरस ( अच्छे रसीले अक्षरो से युक्त ) और । सुवृत्त अच्छे छन्दो वाली ) हो, तो भी बिना भूषण ( अलकार ) के अच्छी नहीं लगती। इसी तरह से स्त्री भी सुजाति (अच्छे वश की ) सुलक्षणी ( अच्छे लक्षणो वाली) सुवरनसरस अच्छे रग की या गौरवर्ण तथा रसीली ) और सुदृत्त ( अच्छा बोलने वाली ) हो, तो भी बिना भूषण या (महनो) के अच्छो नहीं लगती। कविन कहे कवितानिक, अलङ्कार द्वै रूप । एक कहे साधारणहि, एक विशिष्ट स्वरूप ॥२॥ कवियो ने काव्यालङ्कारो के दो रूप वर्णन किये है। एक को साधा. रण कहते है और दूसरे को विशिष्ट । सामान्य सामान्यालङ्कार को, चारि प्रकार प्रकास । वर्ण, वयं भू-राज श्री, भूषण केशवदास ॥३॥ 'केशवदास' कहते हैं कि सामान्यलवार के चार प्रकार हैं । (५) वर्ण (२) वर्ण्य (३) भूमि-श्री (४) राज्य-श्री। (५ वर्णालङ्कार श्वेत, पीत, कारे, अरुण, धूम्र, सुनीले, वर्ण । मिश्रित, केशवदास कहि, सात भॉति शुभ कर्ण ॥४||