पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/५८

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( ४४ ) 'केशवदास' कहते है कि कविता मे श्वेन पीला, काला लाल, धूम्र नीला और मिश्रित ये सातरग ही शुभकरण (मगलकारी) माने जाते है। श्वेत वर्णन कीरति, हरिहय, शरदघन, जोन्ह, जरा, मदार । हरि, हर, हरगिरि, सूर, शशि, सुधासौध धनसार ॥५॥ कीर्ति, इन्द्र, शरदघन, चादनी, बुढापा, कल्प-श, हरि ( श्री विष्णु ) हर श्री महादेव ), कैलाश पर्वत, सूर्य, चन्द्रमा, चूना और कपूर । बल, बक, हीरा, केवरो, कौड़ा करका कांस। कुंद केचुली कमल, हिमि, सिकता भसम कपास ॥६॥ श्री बलदेव जी, बगुला, हीरा, केवडा, कौड़ी, ओला, कास, कुद, केचुली, कमल, बर्फ, बालू, भस्म और कपास । खाँड, हाड, निर्भर चॅवर, चदन, हस, मुरार। छत्र, सत्ययुग, दूध, दधि, शख, सिह, उड़मार ॥७॥ खाड ( चीनी ) हाड, झरना, चँवर, चन्दन, हस कमल को जड, छत्र, सत्ययुग, दूध, दही, शख, सिह और तारे। शेष, सुकृति, शुचि, सत्त्वगुण, संतन के मन, हास । सीप, चून, भोडर, फटिक, खटिका, फेन प्रकास ॥८॥ शेषनाग, सुकृति ( पुण्य ) सत्त्वगुण सज्जनो का हास्य, सीप, चूना, अबरक, स्फटिक, खडिया, फेन और प्रकाश । शुक्र, सुदरशन, सुरसरित, वारन, बाजि, समेत । नारद, पारद, कमलजल, शारदादि सब श्वेत ॥l शुक्र, सुदर्शन, सुरसरित ( गगा ) सुरवारन ( ऐरावत ), सुरवाणि ( उच्चश्वा ), नारदमुनि, पारद (पारा ), निर्मल जल और शारदाजी (सरस्वती) ये सब श्वेत है ।