पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/५९

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उदाहरण (१) कीन्हे छत्र छितिपति, केशोदास गणपति, दसन, बसन, बसुमति कह्याचार है। बिधि कीन्हों आसन, शरासन असमसर, ___ आसन को कीन्हो पाकशासन तुषार है। हरि करी सेज हरिप्रिया करो नाक मोती, हर कत्यो तिलक हराहू कियो हार है। राजा दशरथ सुत सुनौ राजा रामचन्द्र, रावरो सुयश सब जग को सिगारु है ॥१०॥ 'केशवदास कहते है कि-हे राजा दशरथ के पुत्र श्री रामचन्द्र सुनो। आपका सुयश सारे ससार के गार का कारण है, क्योकि राजाओ ने अपने छात्र, उसी से निर्मित किये है और श्री गणेशजी ने अपना दाँत भी उसी से बनाया है। पृथ्वी ने अपना सुन्दर वस्त्र ( सागर ) ब्रह्मा ने अपना आसन ' पुडरीक ) कामदेव ने अपना धनुष, इन्द्र ने अपना घोडा (उच्च श्रवा । नारायण ने अपना बिछौना शेषनाग, श्री लक्ष्मी जी ने अपनी नाक का मोती, श्री शकर जी ने अपना तिलक (चन्द्रमा) और पार्वती जी ने उसे अपना हार बनाया है। उदाहरण (२ थै कमित्ता देहदुति हलधर कीन्ही, निशिकर कर, जगकर वाणीवर, विमल विचार है। मुनिगण मन मानि, द्विजन जनेऊ जानि, संख, संखपानि पानि सुखद अपारु है।। 'केशोदास' सविलास विलसै, विलासनीन, सुखमुख मृदुहास, उदय उदार है। राजा दसरथ सुत सुनो राजा रामचन्द्र, रावरो सुयश सब जग को सिंगारु है ॥११॥