पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/६५

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उदाहरण (२) कचित्त हसनि के अवतस रचे रच कीच करि, सुवा के सुधारे मठ कांच के कलससो । गंगाजू के अग संग यमुना तरंग बल, देव का बदन रच्यो बारुणी के रससों। केशव कपाली कंठ कूल कालकूट जैसे, __अमल कमल अलि सोहै ससि सस सो। राजा रामचन्द्र जू के त्रास बस भारे भूप, भूमि छोड़ि भागे फिरे ऐसे अपजस सों॥२७॥ जिस प्रकार कीचड से युक्त सुन्दर हस और काच के कलश से युक्त स्वच्छ मठ, या ममुना को तरगो से युक्त गगा या मदिरा के नशे से युक्त बलदेव जी का मुख' या ( केशव कहते है कि । शिवा जी का विष से युक्त गला, या कालकूट विष या भौंरो से युक्त स्वच्छ कमल या मृगाक से युक्त चन्द्रमा कलकित होता है, उसी प्रकार पराजित होने पर अपयश से हम भो कलकित होगे, यही सोचकर श्रीरामचन्द्रजी के डर के मारे, सभी राजा लोग अपना राज्य छोड़ कर भागे-भागे फिरते है। ४- अरुण वर्णन इद्रगोप, खद्योत कुज, केसरि, कुसुम, विशेखि । केशव, गजमुख, बालरवि, ताबो, तक्षक, लेखि ॥२८॥ इन्द्रगोप । वीरबहूटी , खद्योत जुगनू , कुज ( मगल ग्रह ), केशर, कुसुम, (एक तरह का लाल फूल ), श्रीगणेशजी, बालरवि (प्रात काल के सूर्य ), ताँबा और तक्षक । रसना, अधर, हगत, पल, कुक्कुट शिखा समान । मानिक, सारस सीस, शुक, वानरवदन प्रनान ॥२६॥ जिह्वा, ओठ, आँखा के काने, पल ( मास ), कुक्कुट शिखा ( मुर्गे की चोटी, माणिक्य, सारस का शिर और बन्दर का मुख ।