पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/९५

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पृष्ठ २५६ सवैया ४१ हाथ गह्यो, ब्रजनाथ सुभावही, छूटिगई धुरि धीरजताई, पान भखै मुख नैन रचोरुचि, आरसी देखि कह्यो हम ठाई। दै परिरम्भन मोहन को मन, मोहि लियो सजनी सुखदाई, लाल गुपाल कपोल नखक्षत, तेरे दिये ते महाछवि छाई ॥४१॥ पृष्ठ २६३ दोहा २३ परम तरुणि यों शोभियत, परम ईश अरधङ्ग । कल्पलता जैसी लसै, कल्प वृक्ष के सङ्ग । पृष्ठ ६१ सवैया १० भोर जगी, वृषभानुसुता, अलसी बिलसी निशि कुंजबिहारी । केशव पोंछति अंचलछोरनि, पीक सुलीक गई मिटिकारी ॥ वंकलगे कुचबीच नखक्षत, देखि भई हग दूनी लजारी । मानौ वियोगबराह हन्यो युग, शैलको संधि मे इंगवैडारी॥ पृष्ठ २६४ कवित्त १० दुरि है क्यो भूषन बसन दुति यौवन की, देहि ही की जोति होति द्यौस ऐसी राति है। नाह की सुवास लागै है हे कैसी "केशव", सुभाव ही की वास भौरभीर फोरखाति है। देखि तेरी मूरति की, सूरति बिसूरति हो, लालन को दंग देखिबे का ललचाति है। चलिहैं, क्यों चन्द्रमुखी, कुचनि के भार भये, कुचन के भार से लचकि लङ्क जाति है ॥१०॥