पृष्ठ:काव्य दर्पण.djvu/१०१

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काव्य क्या है ? शुक्लजी के शब्दों में-"जिस प्रकार प्रात्मा को मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है । हृदय की इसी मुक्ति की •साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आयी है उसे कविता कहते है।" _____सबसे अर्वाचीन लक्षण पण्डितराज जगन्नाथ का है । "रमणीयार्थ-प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्" अर्थात् रमणीय अर्थ का प्रतिपादक शब्द काव्य है। इसकी व्याख्या -यों की जा सकती है । जिस शब्द या जिन शब्दों के अर्थ अर्थात् मानस-प्रत्यक्ष-गोचर वस्तु के बार-बार अनुसन्धान करने से-मनन करने से रमणीयता अर्थात् अनुकूल वेदनीयता, अलौकिक चमत्कार को अनुभूति से संपन्न हो, वह काव्य है । पुत्रोत्पत्ति वा धन-प्राप्ति के प्रतिपादक शब्दों के द्वारा जो श्राह्लादजनक अनुभूति होती है वह अलौकिक नहीं लौकिक है। क्योंकि उसमे मन रमा देने की शक्ति नहीं होती, मोद- माव उत्पन्न करने की शक्ति होती है। रमणीयता और मोदजनकता में बड़ा अन्तर है। दूसरे, उससे क्षणिक रमणीयता की उपलब्धि हो सकती है, तात्कालिक आनन्द हो सकता है । उस रमणीयता में क्षण-क्षण उदीयमान वह नवीनता नहीं, जो मन को बार-बार मोहित कर दे, प्रत्युत् ऐसी बातें बार-बार दुहरायी जाती हैं तो अरुन्तुद हो उठती हैं। अतः, उनसे अलौकिक आनन्द नही हो सकता, सनातन रमणीयता का उपभोग नही किया जा सकता। इससे यहाँ रमणीयता का अर्थ अलौकिक श्रानन्द की प्राप्ति और इस रमणीयता के वाहक शब्द ही हैं। हमारे प्राचार्य उक्त लक्षणों के अनुसार विशिष्ट शब्द वा वाक्य ही को काव्य माननेवाले नही, बल्कि शब्द और अर्थ दोनों को काव्य माननेवाले भी हैं। भामह ने काव्य का लक्षण किया है कि 'सम्मिलित शब्द और अर्थ ही काव्य है।' अर्थात् वाह्य शब्द और अान्तर अर्थ ही सम्मिलित होकर काव्य को स्वरूप प्रदान वरते हैं। ये आचार्य शब्द और अथ दोनों की प्रधानता माननेवाले हैं। शब्द-सौष्ठव को प्रधानता देनेवाले श्राचार्यों का यह अभिप्राय नहीं कि काव्य में अर्थ का अस्तित्व ही नही माना जाय या दूषित अर्थवाले शब्दों को काव्य कहा जाय । इनमें मतभेद का कारण यह है कि काव्य में शब्द या शब्दावली या वाक्य की प्रधानता है या शब्द और अर्थ दोनों की। कहा है कि काव्य का शरीर शब्द और अर्थ हैं, रस आत्मा है, शौर्य आदि गुण है, काणत्व श्रादि के तुल्य दोष हैं, अंगों के सुगठन के समान रीतियां हैं और कटक-कुण्डल के समान अलंकार है। काव्य के पाश्चात्य व्याख्याकारों ने कहा है कि काव्य के अन्तर्गत वे ही पुस्तके आनी चाहिये, जो विषय तथा उसके प्रतिपादन की रीति की विशेषता के कारण मानव-हृदय को स्पर्श करानेवाली हो और जिनमें रूप-सौष्ठव का मूल तत्त्व और