पृष्ठ:कुछ विचार - भाग १.djvu/१३२

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जनता में फैलने का इमकान नहीं। दूसरे वह पढ़े-लिखों को जनता से अलग किये चली जा रही है। यहाँ तक कि इनमें एक दीवार खिंच गई है। साम्राज्यवादी जाति की भाषा में कुछ तो उसके घमण्ड और दबदबे का असर होना ही चाहिये । हम अंग्रेजी पढ़कर अगर अपने को महकूम जाति का अङ्ग भूलकर हाकिम जाति का अङ्ग समझने लगते हैं, कुछ वही ग़रूर, कुछ वही अहम्मन्यता, 'हम चुनी दीगरे नेस्त' वाला भाव, बहुतों में क़सदन, और थोड़े आदमियों में बेजाने पैदा हो जाता है, तो कोई ताज्जुब नहीं । हिन्दुस्तानी साहबों की अपनी बिरादरी हो गई है, उनका रहन-सहन, चाल-ढाल, पहनावा-बर्ताव सब साधारण जनता से अलग है, साफ मालूम होता है कि यह कोई नई उपज है। जो हमारा अंग्रेजी साहब करता है, वही हमारा हिन्दुस्तानी साहब करता है, करने पर मजबूर है। अंग्रेजियत ने उसे हिप्नोटाइज कर दिया है, उसमें बेहद उदारता आ गई है, छूतछात से सोलहो आना नफ़रत हो गई है, वह अंग्रेजी साहब की मेज़ का जूठन भी खा लेगा और उसे गुरु का प्रसाद समझ लेगा; लेकिन जनता उसकी उदारता में स्थान नहीं पा सकती, उसे तो वह काला आदमी समझता है। हाँ, जब कभी अंग्रेजी साहबों से उसे कोई ठोकर मिलती है, तो वह दौड़ा हुआ जनता के पास फरियाद करने जाता है, उसी जनता के पास, जिसे वह काला आदमी और अपना भोग्य समझता है। अगर अंग्रेज़ी स्वामी उसे नौकरियाँ देता जाय, उसे, उसके लड़कों, पोतों, सबको, तो उसे अपने हिन्दुस्तानी या गुलाम होने का कभी खयाल भी न आयगा। मुश्किल तो यही है कि वहाँ भी गुञ्जायश नहीं है। ठोकरें-पर-ठोकरें मिलती हैं, तब यह क्लास देश-भक्त बन जाता है और जनता का वकील और नेता बनकर उसका जोर लेकर अंग्रेज साहब का मुक़ाबिला करना चाहता है । तब उसे ऐसी भाषा की कमी महसूस होती है, जिसके द्वारा वह जनता तक पहुँच सके। कांग्रेस को जो थोड़ा-बहुत यश मिला, वह जनता को उसी भाषा में अपील करने से मिला । हिन्दुस्तान में इस वक्त