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रमानाथ-कुछ नहीं, दो-एक खरोंचे लग गई। मैं बहुत बचाकर निकला।

देवीदीन—बहू की चिट्ठी मिल गई न?

रमानाथ–हाँ, उसी वक्त मिल गई थी। क्या वह भी तुम्हारे साथ थी?

देवीदीन-वह मेरे साथ नहीं थीं, मैं उनके साथ था। जब से तुम्हें मोटर पर आते देखा, तभी से जाने-जाने की रट लगाए हुए थीं।

रमानाथ–तुमने कोई खत लिखा था?

देवीदीन—मैंने कोई खत-पत्तर नहीं लिखा भैया। जब वह आई तो मुझे आप ही अचंभा हुआ कि बिना जाने-बूझे कैसे आ गई? पीछे से उन्होंने बताया। वह सतरंज वाला नकसा उन्हीं ने पराग से भेजा था और इनाम भी वहीं से आया था।

रमा की आँखें फैल गईं। जालपा की चतुराई ने उसे विस्मय में डाल दिया। इसके साथ ही पराजय के भाव ने उसे कुछ खिन्न कर दिया। यहाँ भी उसकी हार हुई! इस बुरी तरह!

बुढिया ऊपर गई हुई थी। देवीदीन ने जीने के पास जाकर कहा-अरे क्या करती है? बहू से कह दे, एक आदमी उनसे मिलने आया है।

यह कहकर देवीदीन ने फिर रमा का हाथ पकड़ लिया और बोला-चलो, अब सरकार में तुम्हारी पेसी होगी। बहुत भागे थे। बिना वारंट के पकड़े गए। इतनी आसानी से पुलिस भी न पकड़ सकती!

रमा का मनोल्लास द्रवित हो गया था। लज्जा से गड़ा जाता था। जालपा के प्रश्नों का उसके पास क्या जवाब था। जिस भय से वह भागा था, उसने अंत में उसका पीछा करके उसे परास्त ही कर दिया। वह जालपा के सामने सीधी आँखें भी तो न कर सकता था। उसने हाथ छुड़ा लिया और जीने के पास ठिठक गया। देवीदीन ने पूछा-क्यों रुक गए?

रमा ने सिर खुजलाते हुए कहा-चलो, मैं आता हूँ।

बुढिया ने ऊपर ही से कहा-पूछो, कौन आदमी है, कहाँ से आया है?

देवीदीन ने विनोद किया कहता है, मैं जो कुछ कहूँगा, बहू से ही कहूँगा।

'कोई चिट्ठी लाया है?'

'नहीं!'

सन्नाटा हो गया। देवीदीन ने एक क्षण के बाद पूछा–कह दूँ, लौट जाए?

जालपा जीने पर आकर बोली—कौन आदमी है, पूछती तो हूँ!

'कहता है, बड़ी दूर से आया हूँ!

'है कहाँ?'