पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/१२५

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शतरंज के खिलाड़ी


मिरजा बोले––आज खाने की कैसे ठहरेगी?

मीर––अजी, आज तो रोज़ा है। क्या आपको ज्यादा भूख मालूम होती है?

मिरजा––जी नहीं। शहर में न जाने क्या हो रहा है।

मीर––शहर में कुछ न हो रहा होगा। लोग खाना-खा-कर आराम से सो रहे होंगे। हुजूर नवाब साहब भी ऐशगाह में होंगे।

दोनों सज्जन फिर जो खेलने बैठे, तो तीन बज गये। अबकी मिरजाजी की बाज़ी कमज़ोर थी। चार का गजर बज ही रहा था कि फौज़ का वापसी की आहट मिली। नवाब वाजिदअली पकड़ लिए गये थे, और सेना उन्हें किसी अज्ञात स्थान को लिये जा रही थी। शहर में न कोई हलचल थी, न मार-काट। एक बूंद भी खून नहीं गिरा था। आजतक किमी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शान्ति से, इस तरह खून बहे बिना, न हुई होगी। यह वह अहिंसा न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते हैं यह वह कायरपन था, जिस पर बड़े-से-बड़े कायर भी आँसू बहाते हैं। अवध के विशाल देश का नवाब बन्दी बना चला जाता था, और लखनऊ ऐश की नीद में मस्त था। यह राजनीतिक अधःपतन की चरम सीमा थी।

मिरजा ने कहा–– हुजूर नवाबसाहब को जालिमों ने क़ैद कर लिया है।

मीर––होगा, यह लीजिये शह!

मिरजा––जनाब, जरा ठहरिए। इस वक्त इधर तबीयत