पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/१९५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
१८३
कमलावती


वह साहस और वह वीरत्व अब कहाँ है? आज तुच्छ धन और सम्मान के लोभ से रुस्तम! वीर रुस्तम! सुलतान के एक घृणित कार्य का समर्थन करता है! एक दिन जो साहस दरिद्र रुस्तम ने दिखलाया था, वह आज धनिक रुस्तम नहीं दिखला सकता!! हाय, हाय, रुस्तम, यह क्या करते हो? ज़रा सोचो तो सही, तुम यह क्या करने चले हो?—शाहज़ादा चुप हो गया। रुस्तम सोचने लगा—शाहज़ादे का कहना सच है। सुलतान सत्य ही अन्याय करते हैं। तब क्या रुस्तम सुलतान के विरुद्ध चलेगा? उनकी आज्ञा भंग करेगा? सावधान, रुस्तम! सावधान! शाह जमाल कुछ भी करें; पर तुम सुलतान के बिरुद्ध काम मत करना; नहीं तो तुम्हारी हृदयेश्वरी, प्रियतमा रुखिया बीबी और प्रिय पुत्र, जिन्हें तुम सुलतान के महल में छोड़ आये हो, जल्लादों के हाथ पड़ेंगे। सुलतान उन लोगों को जीता न छोड़ेगा।

रुस्तम बोला— तब आपकी इच्छा क्या है? हम लोग यहीं भिक्षा माँगकर जीवन व्यतीत करें, अथवा गुप्त-चर के हाथ पड़कर प्राण खोवें?

शाह जमाल— क्यों? भिक्षा क्यों माँगेंगे? क्या गुर्जर-देशवासियों में दया और आतिथ्य-सत्कार का इतना अभाव है? विश्वास रक्खो, यदि हम लोगगुर्जर-नृपति से अपना सारा हाल कह देंगे, तो वे हम लोगों का अनिष्ट नहीं करेंगे! सुनते हैं कि हिन्दू शरणागत शत्रुओं का वध नहीं करते। तब किसका भय?

रुस्तम और सह न सका। वह उन्माद-वश भृकुटि-भंग कर