पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/१९६

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गल्प-समुच्चय


बोला—शाहज़ादे, आप हमें क्षमा कीजिये। आप विश्वासघातक के समान यह कह रहे हैं। हमसे यह न होगा।

विश्वास-घातक!—शाहजमाल का शरीर जल उठा। रुस्तम की यह घृष्टता सह्य न हो सकी। तुरन्त तलवार खोंच, व्याघ्र के समान भीषण गजना कर बोले—शैतान, तेरी इतनी स्पर्धा! एक अन्याय के समर्थन न करने से हम विश्वास-घातक हो गये!

चन्द्र के आलोक में जमाल खाँ की तलवार चमक उठी। क्षणभर में एक भयानक काण्ड हो जाता; परन्तु दैवेच्छा से वह रुक गई। उसी समय पीछे से किसी न जमाल खाँ का हाथ पकड़ लिया। स्वतः शाहज़ादे ने पीछे फिर कर देखा। वह एक रमणी थी। शाहज़ादा विस्मय-विमुग्ध हो बोला—तुम कोन हो? हमारे काम में विघ्न क्यों डाला?

(२)

उस रमणी ने हंसकर तिरस्कार-व्यञ्जक स्वर से कहा—आत्म-विवाद कभी अच्छा नहीं होता। आप लोग क्यों विवाद करते थे?

शाहजमाल ने ऐसा कंठ-स्वर कभी नहीं सुना था। वीणा-ध्वनि के समान वह स्वर अत्यन्त मधुर था। उत्तर देने के लिये वह कामिनी की ओर फिरा; पर उस रूप-राशि की ओर वह देखता ही रह गया। उत्तर न दे सका। उसने मन-ही-मन सोचा—ऐसी अपूर्व रूप-राशि और फिर ऐसी अलौकिक शक्ति! निश्चय ही यह रमणी कोई देवी है।—उस रमणी ने फिर कहा—गुर्जर की यह