पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/२१४

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गल्प-समुच्चय

कमला—गुर्जर की रक्षा कैसे होगी? भैरव, हमारी सेना दस हजार से अधिक नहीं है।

भैरव—हाँ, मा, और—और तुम्हारी कैसे रक्षा होगी, मा!

कमलावती का मुख लाल हो गया, फिर तुरन्त ही वह लालिमा चली गई। कमला गम्भीर हो कर बोली—भैरव, हमारी कौन चिन्ता? क्या तू भूल गया कि मैं राजपूत-कन्या हूँ। हम लोगों को मृत्यु से भय नहीं है। अपनी जन्म-भूमि की चिन्ता कर। पिता कहाँ हैं?

भैरव—नगर के बाहर व्यूह-रचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे सोमनाथ के चरण-तल में रहकर युद्ध करेंगे। वे ही हमारी रक्षा करेंगे।—कमला कातर स्वर से बोल उठी—भगवान् सोमनाथ, क्या होगा? क्या करोगे? प्रभो!

सहसा कुमारसिंह वहाँ युद्ध-वेष में आ पहुँचा। कमलावती कुमार का हाथ पकड़कर बोली—कुमार अब क्या होगा?—कुमार उत्साह-पूर्ण स्वर से बोला—किसी का भय नहीं है। कमला, स्वयं स्वयंभू हमारे पृष्ठ पोषक हैं। जहाँ सोमनाथ महाकाल के रूप में विराजमान हैं और जहाँ साक्षात् शक्तिमयी देवी तुम हो, वहाँ कमला, हम लोगों को भय किस बात का है? तुम हमें प्रसन्न मुख से बिदा दो। कमला सजल नेत्रों से बोली—कुमार, आज न-जाने क्यों मेरा हृदय काँपता है? न-जाने क्यों अनिष्ट की आशंका होती है? हाय! इस सर्वनाश और अनर्थ की जड़ मैं ही हूँ। हाय! मैंने क्यों शैतान जमाल को आश्रय दिया?