पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/२४५

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तूती—मैना

सुख के उपासक कुमार का चित्त सात्त्विक सुख का अनुभव करते-करते वैसे ही धवलित हो गया!

प्रेमोन्मत्त मधुप कमलिनी को इतना रिझाता है कि, वह अपने दिल के सब पर्दे खोल कर भौंरे को भीतर बुलाकर, अनेक स्निग्ध-सुगन्धमय आवरणों के अन्दर छिपा लेती है। वह चाहती है कि, मेरी सुन्दरता पर अपना तन-मन-धन न्यौछावर कर देनेवाले अनन्य प्रेमों पर अब कोई दूसरा डाही डीठ न डालने पावे।

हंस-गण प्रति-दिन आते हैं, चमकीली सीपियों के स्फुटोन्मुख मुख चूम-चूमकर चले जाते हैं। सीपियाँ भी एक दिन दिल खोल-कर उनके सामने मोतियों की डाली लगा देती हैं।

वंशी टेरनेवाला, प्रेम में खूब डूब कर, अपने हृदय का माधुर्य्य अधरों में भरकर, जब निभृत निकुञ्ज में सुरीली तान छेड़ने लगता है, तब हृदयहारिणी हरिणी भी कहने लगती है—

'चाम काटि आसन कगे, माँस राँधि कै खाउ;
जब लौं तन में प्रान है, तब लौं बीन बजाउ।'

(४)

भगवान भास्कर संसार-भर के शुभाशुभ कर्मों का निरीक्षण करके, कर्त्तव्य-परायणता का परिचय देते हुए, पश्चिमांचल की ओर चल पड़े। संध्या-वधू ने अपने धूसर अञ्चल से धरणी का नग्न पृष्ट-देश ढक लिया। थोड़ी देर के बाद, ताराओं की मुक्ता-माला पहन, ललाट पर चन्द्र-चन्दन की बिंदी लगा, दिगङ्गनाओं